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भारत की ताकत ने हिला दी दुनिया! सदस्य देशों का विश्व GDP में चौंकाने वाला दबदबा


SCO Summit 2025: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29 अगस्त से 1 सितंबर तक जापान और चीन की यात्रा पर रहेंगे. इस विदेश दौरे का पहला चरण जापान होगा, जबकि दूसरा चरण चीन का, जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की 25वीं शिखर बैठक में शामिल होंगे. तियानजिन शहर में आयोजित होने वाली इस बैठक में मोदी कई देशों के नेताओं से द्विपक्षीय मुलाकात भी कर सकते हैं. हाल ही में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने दिल्ली आकर प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति शी जिनपिंग का औपचारिक निमंत्रण सौंपा था.

यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों से रिश्ते तनावपूर्ण बने हुए हैं. ऐसे समय में मोदी का चीन दौरा न केवल कूटनीतिक दृष्टिकोण से अहम है, बल्कि यह भारत के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी हो सकता है.

SCO Summit 2025: शंघाई सहयोग संगठन 

SCO की स्थापना 2001 में हुई थी. शुरुआत में इसमें छह देश शामिल थे – चीन, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान. बाद में जून 2017 में भारत और पाकिस्तान इसके सदस्य बने. ईरान 2023 में जुड़ा और बेलारूस 2024 में शामिल हुआ.

आज SCO के पास कुल 10 सदस्य देश हैं: भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान. इसके अलावा अफगानिस्तान और मंगोलिया पर्यवेक्षक देश हैं, जबकि 14 अन्य देश संवाद साझेदार के रूप में जुड़े हुए हैं.

SCO मूल रूप से “शंघाई फाइव” का विस्तार है, जिसे 1996 में बनाया गया था. इसका मकसद सीमाई सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना था. बीते दो दशकों में यह संगठन एशिया का सबसे बड़ा राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक मंच बन चुका है.

SCO का वैश्विक महत्व

आज SCO न केवल भूगोल के लिहाज से बड़ा है, बल्कि जनसंख्या और अर्थव्यवस्था के पैमाने पर भी असरदार है. SCO के सदस्य देश धरती के कुल भूभाग का 24 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं. इसकी संयुक्त आबादी 3.46 अरब है, जो विश्व जनसंख्या का 42 प्रतिशत है. सिर्फ भारत (1.46 अरब) और चीन (1.41 अरब) की संयुक्त आबादी ही दुनिया की कुल जनसंख्या का लगभग 35 प्रतिशत है.

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SCO की दुनिया की जीडीपी में योगदान और भारत का

वैश्विक अर्थव्यवस्था के नजरिए से भी SCO एक बड़ा खिलाड़ी है. स्टेटिस्टा के अनुसार, 2023 में SCO देशों की संयुक्त जीडीपी 24.4 ट्रिलियन डॉलर रही. यह दुनिया की कुल जीडीपी (106.17 ट्रिलियन डॉलर) का 23.16 प्रतिशत हिस्सा है. परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर SCO का योगदान और बढ़कर 36 प्रतिशत हो जाता है. SCO की कुल जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान तीन देशों का है जिसमें चीन  का 17.8 ट्रिलियन डॉलर, भारत का 3.56 ट्रिलियन डॉलर और रूस का 2.02 ट्रिलियन डॉलर. इन तीनों का योगदान मिलाकर SCO की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 95 प्रतिशत बनता है.

अन्य वैश्विक समूहों से तुलना

SCO की आर्थिक ताकत को समझने के लिए इसे अन्य प्रमुख समूहों से तुलना करना जरूरी है. 2023 में यूरोपीय संघ (EU) की जीडीपी SCO से लगभग 6 ट्रिलियन डॉलर कम रही. हालांकि, G7 देशों की संयुक्त जीडीपी 46.8 ट्रिलियन डॉलर रही, जो वैश्विक जीडीपी का 45 प्रतिशत है. वहीं, G20 देशों का योगदान 78 प्रतिशत तक पहुंचता है, क्योंकि इसमें अमेरिका और चीन जैसे बड़े देश शामिल हैं. यह तुलना दिखाती है कि SCO एक मजबूत ब्लॉक तो है, लेकिन वैश्विक स्तर पर अभी भी G7 और G20 जैसे समूहों का दबदबा अधिक है.

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व्यापार और विकास में SCO की भूमिका

सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं, व्यापार के मोर्चे पर भी SCO देशों ने तेजी से प्रगति की है. 2001 से 2020 के बीच SCO देशों का आपसी व्यापार लगभग 100 गुना बढ़ा. इस अवधि में वैश्विक व्यापार में SCO की हिस्सेदारी 5.4 प्रतिशत से बढ़कर 17.5 प्रतिशत हो गई. यह दिखाता है कि SCO अब केवल सुरक्षा मंच नहीं रहा, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विकास का अहम केंद्र बन चुका है.

सदस्य, ऑब्जर्वर और संवाद साझेदार

सदस्य देश (10) भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान हैं. ऑब्जर्वर (2) अफगानिस्तान और मंगोलिया हैं और संवाद साझेदार (14) अजरबैजान, आर्मेनिया, कंबोडिया, नेपाल, तुर्की, श्रीलंका, यूएई, कुवैत, मालदीव, बहरीन, म्यांमार, मिस्र, सऊदी अरब और कतर.

तियानजिन में होने वाली SCO समिट भारत के लिए कई मायनों में खास है. यह न केवल एक बहुपक्षीय मंच है, बल्कि भारत और चीन जैसे देशों के लिए आपसी रिश्तों को सुधारने और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने का अवसर भी है. आर्थिक मोर्चे पर देखें तो SCO पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ है. 24.4 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त जीडीपी, दुनिया की 42% आबादी और तेजी से बढ़ते व्यापार के साथ यह संगठन वैश्विक संतुलन में एक अहम भूमिका निभा सकता है. प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा भारत के लिए कूटनीति, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी – तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.