SCO समिट में चटक जाएगा अमेरिका का घमंड! तियानजिन में मोदी-पुतिन की जोड़ी से कांप उठेंगे चीन के दुश्मन
SCO Summit Tianjin 2025: चीन के तियानजिन शहर में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का शिखर सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है. इस सम्मेलन में भारत, रूस, पाकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान, बेलारूस और तुर्की समेत 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा लेंगे. साथ ही 10 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहेंगे. यह पिछले 10 वर्षों में होने वाला सबसे बड़ा SCO सम्मेलन है. इस मंच पर चीन यह दिखाना चाहता है कि अमेरिका अब दुनिया का अकेला सुपरपावर नहीं है और वैश्विक राजनीति में पश्चिमी देशों के खिलाफ एक नया खेमा तैयार हो चुका है. ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी-पुतिन की जोड़ी की मौजूदगी से पूरी दुनिया का ध्यान खींच रही है और साथ में चीन भी अपने दुश्मनों को साफ संदेश देगा.
China US Tensions: अमेरिका के दबाव के बीच चीन का संदेश
चीन SCO के मंच से अपनी आर्थिक और राजनीतिक ताकत दिखाना चाहता है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग यह साबित करना चाहते हैं कि पश्चिमी दबाव का असर अब सीमित हो गया है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया था, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा. वहीं, रूस पर अमेरिकी दबाव भी कमजोर पड़ा है. ऐसे माहौल में चीन SCO को पश्चिमी प्रभाव के विकल्प के रूप में पेश करेगा.
SCO Summit Tianjin 2025 in Hindi: सात साल बाद मोदी की चीन यात्रा
यह मोदी की 2019 के बाद पहली चीन यात्रा है. 2020 के गलवान संघर्ष ने दोनों देशों के संबंधों में तनाव भर दिया था. प्रत्यक्ष उड़ानें बंद हो गई थीं और कैलाश-मानसरोवर यात्राएं रोक दी गई थीं. अब लगभग आधे दशक बाद मोदी का चीन दौरा रिश्तों को फिर से संवाद की पटरी पर लाने का अवसर है. सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी मौजूद रहेंगे, जिससे इस आयोजन का महत्व और बढ़ गया है.
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रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिश
पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन ने आपसी तनाव कम करने के संकेत दिए हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच बैठकें हुईं. सीमा प्रबंधन के लिए नई संचार प्रणाली और विशेषज्ञ समूह बनाए गए. प्रत्यक्ष उड़ानें फिर से शुरू हुईं और कैलाश-मानसरोवर यात्रा को दोबारा अनुमति दी गई. चीन से दुर्लभ खनिज और उर्वरक का निर्यात भी बहाल हुआ. हालांकि, आपसी विश्वास की कमी अभी भी बरकरार है. इसे “रीसेट” कहना मुश्किल है, लेकिन संवाद बनाए रखने का इरादा जरूर दिखता है.
अमेरिका-चीन तनाव के बीच भारत की रणनीति
भारत “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति पर आगे बढ़ रहा है. मोदी इस सम्मेलन से पहले जापान-भारत वार्षिक बैठक में भी शामिल होंगे. इसका मकसद यह संदेश देना है कि भारत न तो पूरी तरह अमेरिका के पक्ष में है और न ही चीन के सामने झुकने वाला है. SCO का मंच भारत को यह दिखाने का अवसर देगा कि वह स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है.
भारत इस सम्मेलन में आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाने वाला है. हाल ही में भारत ने SCO रक्षा मंत्रियों की बैठक में साझा बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था क्योंकि उसमें आतंकवाद को लेकर पर्याप्त कठोर भाषा नहीं थी. पाकिस्तान की मौजूदगी में भारत यह मुद्दा मजबूती से उठाएगा.
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ऐतिहासिक रिश्ते और संभावनाएं
भारत और चीन का रिश्ता सदियों पुराना है. कुशाण साम्राज्य और हान वंश से लेकर बौद्ध धर्म और ह्वेनसांग की यात्राएं इसका प्रमाण हैं. इस साल दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ भी है. भारत 1950 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता देने वाला पहला गैर-सोशलिस्ट देश था. आज भारत तेजी से बढ़ती युवा आबादी और उपभोक्ता बाजार के साथ उभर रहा है, जबकि चीन बुनियादी ढांचे और विनिर्माण में अग्रणी है. एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) से भारत को सबसे ज्यादा फंडिंग मिली है. अगर दोनों देश सहयोग करें तो विकास की अपार संभावनाएं खुल सकती हैं.
तियानजिन में होने वाला SCO शिखर सम्मेलन भारत और चीन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. यह किसी बड़े समझौते का मंच तो शायद न बने, लेकिन संवाद बहाली और तनाव कम करने का मौका जरूर देगा. मोदी की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि भारत किसी भी धुरी पर निर्भर नहीं है, बल्कि अपनी विदेश नीति की दिशा खुद तय करता है.