OM BIRLA: भुवनेश्वर में संसद एवं राज्य विधान मंडलों की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समितियों के सभापतियों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन शुक्रवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया. इस राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन पहली बार दिल्ली से बाहर किया गया है. 1976 में इसका पहला आयोजन नयी दिल्ली में हुआ था, जबकि इसके बाद 1979, 1983, 1987 और 2001 में भी सम्मेलन हुए. इन आयोजनों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण से जुड़े संवैधानिक व्यवस्थाओं और योजनाओं पर गहन विचार-विमर्श हुआ. इस बार सम्मेलन का विषय है, ‘अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण, विकास और सशक्तिकरण में संसद तथा राज्य विधान मंडलों की समितियों की भूमिका’
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि लोकतंत्र का सार स्वस्थ बहस और संवाद में है. किंतु हाल के वर्षों में संसद और विधानसभाओं में चर्चा का स्तर गिरा है. केवल नारेबाजी से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, बल्कि सार्थक विमर्श और ठोस नीतियों से ही राष्ट्र का भविष्य तय होता है. लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब विधायक और सांसद राष्ट्रहित के मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चर्चा करेंगे. विधानमंडलों की बैठकों की संख्या कम होना और सदन में सदस्यों का अमर्यादित आचरण लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है.
समितियां लोकतंत्र का आधार
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसदीय समितियां लोकतंत्र की आत्मा हैं. सदन की राजनीतिक बाध्यताओं से इतर ये समितियां निष्पक्ष और गहन समीक्षा करती हैं. खासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समितियां. बजट, योजनाओं और नीतियों के क्रियान्वयन की बारीकी से जांच करती हैं. उनकी रिपोर्ट न केवल सरकार को जवाबदेह बनाती है, बल्कि सुधार का मार्ग भी सुझाती है. समितियों का उद्देश्य दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समाज के कमजोर वर्गों तक विकास का लाभ पहुंचाना है. उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि इस सम्मेलन से व्यावहारिक सुझाव और ठोस रणनीतियां निकलकर सामने आयेंगी, जो अनुसूचित जाति और जनजाति वर्गों के उत्थान तथा 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगी.
2047 तक विकसित भारत का संकल्प
बिरला ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का निर्माण तभी संभव है जब सभी नागरिकों को न्याय, समानता और सम्मान मिले. इसके लिए आवश्यक है कि कल्याणकारी योजनाओं का समय पर क्रियान्वयन हो और निगरानी तंत्र मजबूत किया जाए. उन्होंने कहा कि हर साल वंचित वर्गों के कल्याण के लिए पर्याप्त संसाधन आवंटित किए जाते हैं, किंतु उनका सही उपयोग सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है.
उन्होंने शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे सुधारों से कमजोर वर्गों को नए अवसर मिल रहे हैं.
सच्चा सशक्तिकरण केवल वित्तीय सहायता तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक अवसर प्रदान करने में है. सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और संसदीय समिति के सभापति डॉ. फग्गन सिंह कुलस्ते भी उपस्थित थे.