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आखिर क्यूं समाज में नकारे जाते हैं मुख मियां मिट्ठू… चाणक्य नें बताएं 3 कारण


Chanakya Niti: समाज में ‘मुख मियां मिट्ठू’ क्यों नकारे जाते हैं? जानें चाणक्य का गहरा संदेश जो आज भी उतना ही सच है.

Chanakya Niti: जीवन का शायद ही ऐसा कोई पहलू है जिसके बारें में आचार्य चाणक्य ने अपने विचार प्रस्तुत न किए हों. समाज में आचरण और व्यवहार को लेकर उनके विचार इंसान को मार्गदर्शन देते हैं, सचेत भी करते है, इसी संदर्भ में उन्होंने आत्म-प्रशंसा अर्थात् ‘मुख मियां मिट्ठू’ बनने के नुकसान बताए हैं.

Chanakya Niti Quotes: आचार्य चाणक्य के विचार

“जिस गुण की दूसरे लोग प्रशंसा करें, वही सच्चा गुण है और उससे सामान्य व्यक्ति भी गुणवान हो जाता है. पर अपने मुंह से अपनी प्रशंसा करने से इंद्र भी लघुता को प्राप्त होते हैं.”
– चाणक्य नीति शतक

अर्थ
Chanakya Niti के इस श्लोक का अर्थ यह है कि सच्चे गुण और अच्छाइयां वही हैं जिन्हें लोग स्वयं देख कर सराहें. जब समाज या दूसरे लोग किसी गुण की प्रशंसा करते हैं, तो उस गुण की महत्ता बढ़ जाती है और व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी स्वाभाविक रूप से ऊंची हो जाती है.

लेकिन यदि कोई व्यक्ति स्वयं अपने मुंह से अपनी तारीफ करता है, तो उसका महत्व घट जाता है. यहां तक कि यदि स्वर्ग के राजा इंद्र भी स्वयं अपनी प्रशंसा करें, तो उनकी गरिमा भी कम हो जाती है.

Chanakya Niti for Muh Miya Mitthu: समाज में क्यूं नकारें जाते है खुद की तारीफ खुद से करने वाले लोग?

Chanakya Niti Survival Skills
Ai generated image of acharya chanakya

चाणक्य का यह संदेश बहुत ही गहन है. हम अक्सर देखते हैं कि समाज में ऐसे लोग नकारे जाते हैं जो हर समय अपनी ही तारीफ़ करते रहते हैं. ऐसे लोग धीरे-धीरे ‘मुख मियां मिट्ठू’ (Muh Miya Mitthu) कहलाने लगते हैं. कारण यह है कि आत्म-प्रशंसा कभी भी विश्वसनीय नहीं होती, इससे-

  1. लोग ऐसे व्यक्ति को घमंडी समझने लगते हैं.
  2. आत्म-प्रशंसा को लोग अक्सर अतिशयोक्ति मानते हैं.
  3. गुण छोटे हो जाते हैं क्योंकि उनकी पुष्टि दूसरों से नहीं होती.
  4. समाज ऐसे लोगों को हल्के में लेने लगता है.

जब आप खुद अपने गुणों का बखान करते हैं, तो लोग उसे अहंकार समझते हैं और आपकी सच्ची योग्यता को नजरअंदाज कर देते हैं. इसके विपरीत, जब आपके काम या गुणों की सराहना दूसरे लोग करते हैं, तो आपकी प्रतिष्ठा और विश्वासनीयता बढ़ती है.
चाणक्य का यह सूत्र हमें यह सीख देता है कि सच्चे गुण वही हैं जो अपने आप चमकते हैं और जिनकी पहचान समाज करता है. आत्म-प्रशंसा के बजाय हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए. जब कर्म उत्कृष्ट होंगे, तो उनकी गूंज अपने आप लोगों के बीच पहुंचेगी और सम्मान भी स्वतः प्राप्त होगा.

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Disclaimer: यह आर्टिकल सामान्य जानकारियों और मान्यताओं पर आधारित है. प्रभात खबर इसकी पुष्टि नहीं करता