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जिन्ना और सिखों में क्यों हुआ था झगड़ा? हुआ बड़ा खुलासा


India Pakistan Partition: आधुनिक भारत के इतिहास में आजादी जितनी अहम घटना थी, उतना ही गहरा घाव देश के विभाजन ने दिया. 1947 के बंटवारे ने पंजाब और बंगाल में भारी तबाही मचाई, जिसे आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में गिना जाता है. अनुमान के मुताबिक करीब 10 लाख लोग मारे गए और एक करोड़ से अधिक लोग पाकिस्तान से भारत की ओर पलायन करने को मजबूर हुए. इनमें हिंदू और सिख बड़ी संख्या में थे. विशेषकर पंजाब में लोग अपने घर, जमीन-जायदाद छोड़कर खाली हाथ भारत के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे.

जिन्ना और सिख नेताओं की बैठक (India Pakistan Partition)

सिख इतिहासकार तरलोचन सिंह ने ANI के पॉडकास्ट में खुलासा किया कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पूरे पंजाब को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने सिख नेताओं से मुलाकात की और प्रस्ताव रखा कि यदि वे सहमति दे दें तो उन्हें पाकिस्तान में स्वायत्तता मिल जाएगी. जिन्ना का मानना था कि उनकी बात को कोई नकार नहीं सकेगा.

हालांकि, सिख नेताओं ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया. उन्होंने साफ कहा कि मौखिक वादों पर विश्वास नहीं किया जा सकता और यदि ऐसा होता है तो इसे संविधान में दर्ज होना चाहिए. जिन्ना इस पर कोई लिखित भरोसा देने को तैयार नहीं हुए और इसी मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बढ़ गए.

सिख अलगाववाद की जड़ें विभाजन में (India Pakistan Partition)

तरलोचन सिंह ने आगे कहा कि स्वतंत्रता के समय पंजाब मुस्लिम बहुल था. अगर सिख नेतृत्व दृढ़ न होता तो पूरा पंजाब पाकिस्तान में चला जाता. उन्होंने कहा कि सिखों के भीतर आज भी यह दर्द है कि ननकाना साहिब पाकिस्तान में छूट गया और लाखों की संख्या में सिख विभाजन की हिंसा में मारे गए. उन्होंने यह भी जोड़ा कि सिख अलगाववाद की जड़ें भी विभाजन से ही जुड़ी हैं. सिखों को लगता है कि उनके बलिदानों की कद्र नहीं हुई और उनकी सीमा, जो कभी अटारी से गुरुग्राम तक मानी जाती थी, आज बहुत सीमित होकर रह गई है.

शिक्षा में विभाजन का जिक्र जरूरी (India Pakistan Partition)

तरलोचन सिंह ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में इस मुद्दे को उठाया था. उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में विभाजन की वास्तविकता को ठीक से पढ़ाया ही नहीं गया है. अब समय आ गया है कि इस त्रासदी और उसके नतीजों को भावी पीढ़ी के लिए पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए.