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सरकार के उदासीन रवैये के कारण सम्बद्ध डिग्री महाविद्यालय के शिक्षकों,कर्मियों की स्थिति दयनीय

 

वर्तमान में भुखमरी के कगार पर हैं सम्बद्ध डिग्री महाविद्यालय के कर्मियों की स्थिति

वहीं सूत्रों की माने तो कुलपति/प्रतिकुलपति की नियुक्ति में करोड़ो रुपये के रकम की हुई उगाही

 

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि शुक्रवार को बिहार में चुनाव की घोषणा हो चुकी है । तीन चरणों मे चुनाव होंगे ।
आज हम बात करेंगे सम्बद्ध डिग्री महाविद्यालय के शिक्षकों,कर्मियों की स्थिति के बारे में ।

बिहार में लगभग 250 सम्बद्ध डिग्री महाविद्यालय था, किन्तु पूरी जांच में लगभग 100 सम्बद्ध डिग्री महाविद्यालय
सही पाए गए। लेकिन 2012 से 2020 का अनुदान विभिन्न जांच पड़ताल के नाम पर लंबित पड़ा है। इसके पीछे कारण है कि सत्तारूढ़ दल के अधिकांश सांसद, विधायक,मंत्री के माध्यम से ये कॉलेज संचालित किए जाते है,जिसके कारण लगभग 250 कॉलेजों से प्रतिवर्ष इन संचालकों को 20 लाख से लेकर 50 लाख की अवैध काली कमाई होती है। सरकार के बार बार चेतावनी के बावजूद भी आंतरिक श्रोत से होने वाली आय से कॉलेजों के शिक्षक कर्मियों को 70 प्रतिशत नियमानुसार मासिक वेतन देने का भी निर्देश दिए गए । इनको ईपीएफ दिए जाने का भी प्रावधान है परंतु कॉलेज प्रबंधन द्वारा स्थापनकाल से लेकर आजतक ना तो नियमानुसार वेतन दिया गया है और ना ही सरकार द्वरा दिए गए अनुदान की राशि ही नियमानुसार दी गयी। बल्कि अपने हिसाब से अपने अपने चेहरे को बिना नियम कानून का भुगतान किया गया।
2008 से 2011 तक में मिले राशि का भी सही -सही नियमानुसार.भुगतान राशि नहीं दिए गए है जिसके कारण राज्य के उच्च शिक्षा कर्मियों के जीवन अधर में लटका हुआ है ।
ये लोग नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं । वर्त्तमान में ये लोग भुखमरी के कगार पर पहुच गए हैं। करीबन 1 दर्जन से अधिक कर्मियों की मौत पैसे के अभाव में दवा दारू के कारण हो गई।
जब- जब चुनाव आते है प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने तेवर में भुगतान करने का निर्देश देते हैं, वित्त विभाग से पैसा भी रिलीज किया जाता है परंतु उन कर्मियों तक ये भुगतान नही पहुच पाता है। इसके पीछे ये कारण है कि बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति प्रति कुलपति, रजिस्टार की नियुक्तियां राजपाल और राज्यसरकार के सहमति से होता है।
पैनल में नाम राज्यसरकार राजभवन को भेजती है जिसे राजभवन स्व स्वीकृति दी जाती है ।
अगर हम सूत्रों की माने तो कुलपति /प्रतिकुलपति की नियुक्ति मोटी रकम लेकर की गई।
अगर अपने सूत्रों की माने तो कुलपति के लिए एक करोड़ से ऊपर रकम लिए जाते है। वही प्रतिकुलपति के लिए 60 से लेकर 80 लाख तक रकम ली जाती है।
ऐसे में कहा से वित्तरहित शिक्षकों का भला होगा। क्या प्रदेश सरकार को इनकी हालात मालूम नहीं, या मालूम करने में कोई दिलचस्पी नहीं है । अब चुनाव आया तो लंबी लंबी घोषणा , आखिर क्यों ? संजय कुमार बबलू जिला संवाददाता समस्तीपुर बिहार