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शिवसेना बोली, कश्मीर कुछ मुसलमानों को ‘तोहफे’ के रूप में नहीं दिया गया

मुंबई। नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में गृह मंत्री बनाए गए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पद संभाले के बाद जम्मू कश्मीर को लेकर बैठकें कर रहे हैं। हाल ही में गृह मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के परिसीमन की घोषणा की थी। अब एनडीए की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने इस कदम का स्वागत किया है। शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए कहा है कि, गृहमंत्री के रूप में अमित शाह ने क्या करना तय किया है, यह स्पष्ट हो गया है। जम्मू-कश्मीर की समस्या का बड़ा ऑपरेशन करने के लिए उसे उन्होंने टेबल पर लिया है। कश्मीर घाटी में हमेशा के लिए शांति स्थापित करना ये मामला तो है ही, साथ ही कश्मीर सिर्फ हिंदुस्तान का हिस्सा है, ऐसा पाक तथा अलगाववादियों को अंतिम संदेश देना भी जरूरी है। अमित शाह उस दिशा में कदम उठा रहे हैं।स्थानीय दलों की आलोचना करते हुए सामना ने लिखा कि, परिसीमन न हो इसके लिए राज्य के स्थानीय दल 2002 से केंद्र के सिर पर बैठे हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा का परिसीमन किया गया तो स्थानीय लोगों में आक्रोश बढ़ जाएगा, ऐसा भय हमेशा से दिखाया गया। जिसके आगे पहले की कांग्रेसी सरकार के केंद्रीय गृहमंत्री ने हथियार डाल दिए थे। अब देश की तस्वीर बदल चुकी है और अमित शाह ने कश्मीर मसले को प्राथमिकता दी है। नए केंद्रीय गृहमंत्री की यही कार्यप्रणाली दिखाई दे रही है। अब तक मुस्लिम जनसंख्या के दबाव तले जम्मू-कश्मीर की राजनीति की जाती थी। सामना में कहा गया है कि, जम्मू-कश्मीर घाटी में मुस्लिम 68.35 प्रतिशत तो हिंदू 28.45 प्रतिशत हैं। सिख भी हैं। इसका मतलब ये नहीं कि कश्मीर कुछ मुसलमानों को ‘तोहफे’ के रूप में नहीं दिया गया है। वहां के तमाम मुसलमान खुद को कश्मीरी मानते हैं, फिर भी ये सभी हिंदुस्थान के नागरिक हैं और देश के कायदे-कानून उन पर भी लागू होने चाहिए। उसके लिए जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाई जानी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी की इस तरह की भूमिका बहुत पहले से है। सामना के अनुसार पहले तो कश्मीर के राजा हरि सिंह ही थे, लेकिन आज़ादी के बाद कोई भी हिंदू मुख्यमंत्री नहीं बन पाया है। मुस्लिमों को कश्मीर एक तोहफे में नहीं दिया गया था।