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लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है, पर जनप्रतिनिधियों में अनुभव और शालीनता का होना अपरिहार्य है

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आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है। यदि इस आत्मा का स्वरूप विकृत हो जाए तो लोकतंत्र भी विकृत हो जाएगा। आलोचना रचनात्मक होनी चाहिए ताकि विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं में ‘अवरोध और संतुलन’ बना रहे तथा सरकार उत्तरदायी, संवेदनशील एवं पारदर्शी हो सके। लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों को जनता चुनती है। केवल ज्यादा वोट पाने से सरकार को अधिकार नहीं मिलता कि वह अपनी ही पार्टी का प्रोग्राम लागू करे और विपक्ष को दरकिनार कर दे। इंग्लैैंड में ‘ब्रेक्जिट’ का अनुभव इसका ताजा उदाहरण है। विपक्षी दलों और प्रेस पर आलोचना की प्रमुख जिम्मेदारी होती है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस में विचारधारा, नेतृत्व और दलीय लोकतंत्र का संकट है जिससे आंतरिक कलह बढ़ गया है। यही हाल कमोबेश अन्य दलों का भी है। मीडिया का भी एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे सत्तापक्ष और विपक्ष में बंटता जा रहा है जिससे उनकी विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में है।