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भारत के साथ मिलना चाहते थे बलूचिस्‍तान के लोग, लेकिन नेहरू ने कर दिया था इनकार!

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नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। बलूचिस्‍तान का मुद्दा संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार आयोग के जरिए फिर पूरी दुनिया में गरमा गया है। बलूचिस्‍तान के लोगों का पाकिस्‍तान की सरकार और सेना किस तरह से दमन कर रही है यह पूरी दुनिया जान चुकी है। इसको लेकर बलूचिस्‍तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में रह रहे बलूच प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले दिनों जब यूएनएचआरसी (UNHRC) में यह मुद्दा गरमाया तब भी बलूच समर्थकों ने पाकिस्‍तान के खिलाफ जमकर नारेबाजी की थी। बलूचिस्‍तान का मसला कुछ साल नहीं बल्कि दशकों पुराना है। हकीकत तो ये है कि पाकिस्‍तान के बनने के साथ ही यह मुद्दा खड़ा हो गया था। इसके साथ ही बलूचों के साथ हो रहा अन्‍याय भी उसी वक्‍त जोर पकड़ा था। ‘The Balochistan Conundrum’ किताब में इस मसले का जिक्र किया गया है। इस किताब को कैबिनेट सचिवालय में विशेष सचिव रहे तिलक देवेशर ने लिखा है।

बलूच आज जो पाकिस्‍तान से अलग होने को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं वह भी पाकिस्‍तान की आजादी के साथ ही शुरू हुआ था। 1948 से ही ज्‍यादातर बलूचों के मन में यह बात घरकर गई थी कि उन्‍हें जबरन पाकिस्‍तान के साथ मिलाया गया है। लेकिन उस वक्‍त हुए विरोध के सामने तत्‍कालीन पाकिस्‍तान की सरकार झुक गई थी। इतना ही नहीं अंग्रेजों की विदाई के साथ ही बलूचों ने अपनी आजादी की घोषणा कर दी थी। पाकिस्‍तान ने भी उनकी ये बात मान ली थी लेकिन वो बाद में इससे मुकर गए। उस वक्‍त बलूचों के सबसे बड़े नेता खुदादाद खान हुआ करते थे। वे कलात के खां के नाम से मशहूर थे। कलात उस वक्‍त का बलूचिस्‍तान था और इसके राजकुमार थे खुदादाद। अंग्रेजी हुकूमत के समय में भी उनके राज्‍य पर अंग्रेजो का अधिकार नहीं था। 1876 में उनके साथ जो संधि अंग्रेजों ने की थी उसके मुताबिक बलूचिस्‍तान एकआजाद देश था। उनकी आजाद देश की पहचान को 1946 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नकार दिया था। खान पहले से ही पाकिस्‍तान की आंखों में चढ़े हुए थे। बलूचों के विरोध की वजह से वह और निशाने पर आ गए थे। 1948 में खान को को पाकिस्‍तान की सेना ने गिरफ्तार कर लिया और उनसे जबरन बलूचिस्‍तान के पाकिस्‍तान में विलय के समझौते पर साइन करवा लिए।