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बिहार: जनता की नब्ज टटोल रहे CM नीतीश कुमार

केंद्रीय मंत्रिपरिषद में नीतीश कुमार के शामिल नहीं होने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि नीतीश कुमार का अगला कदम क्या होगा? बिहार में उन्होंने अपने मंत्रिपरिषद का विस्तार जिस अंदाज में किया यह बात इस बात की तस्दीक करती है कि एनडीए के भीतर ऑल इस नॉट वेल है. वहीं, इफ्तार पार्टियों के बहाने जो सियासत का रूप दिख रहा है, वह बिहार की भविष्य की राजनीति किस ओर जा सकती है, इस बात का भी इशारा हो सकती है.

इस बीच, कांग्रेस ने जिस तरीके से नीतीश कुमार के फैसले को बैक किया है, जीतन राम मांझी ने नई दोस्ती की पहल की है और रघुवंश प्रसाद सिंह ने आरजेडी के साथ आने का खुला ऑफर दिया है और अब राबड़ी देवी भी कह चुकी हैं कि नीतीश के महागठबंधन में वापसी पर विचार किया जाएगा. इससे बिहार में आने वाली राजनीति के संकेत के तौर पर भी समझा जा रहा है. हालांकि, नीतीश कुमार 2020 विधानसभा चुनाव को लेकर क्या फैसला लेंगे यह भविष्य के गर्भ में है. राजनीतिक जानकारों का मानें तो फिलहाल वह जनता की नब्ज टटोलने में लगे हैं.

तो क्‍या भविष्य में NDA से अलग हो सकते हैं नीतीश?
वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद कहते हैं कि देखने वाली बात ये है कि नीतीश कुमार को सबसे पहला ऑफर कांग्रेस ने दिया जो खुद अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. दूसरा जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार की नजदीकियों की खबरें हैं. तीसरा रघुवंश प्रसाद सिंह और राबड़ी देवी ने भी नीतीश पर नरमी के संकेत दिए हैं. हालांकि, ये सभी हारे हुए खिलाड़ी हैं और एक चेहरे की तलाश में हैं.

नीतीश भी मानते हैं जनादेश पीएम मोदी के नाम पर
बकौल फैजान अहमद 16 सीटों के साथ जेडीयू बिहार में बीजेपी के लगभग बराबरी पर जरूर है, लेकिन ये भी 16 सीट पाने में पीएम मोदी का चेहरा ही अधिक चला है, न कि नीतीश कुमार का. ये स्वयं नीतीश कुमार भी जानते हैं. दरअसल, लोकसभा चुनाव के पहले दो चरण के चुनाव के दौरान बिहार के सीएम नीतीश कुमार अपने अधिकतर भाषणों में खुद के किए कार्यों को ही गिनाते थे. इसके बाद के तीन चरणों में सीएम नीतीश पीएम नरेन्द्र मोदी के नाम पर वोटिंग की अपील करने लगे.

वहीं वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय की राय कुछ अलग है. वे कहते हैं कि पूरे लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से नीतीश कुमार ने कांग्रेस को कभी टारगेट नहीं किया यह भी भविष्य की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं.

बकौल रवि उपाध्याय कांग्रेस का सपोर्ट, मांझी की दोस्ती की पहल और आरजेडी का खुला ऑफर इस बात की ओर ही इशारा करती है कि अगर एनडीए से अलग होने की कोई संभावित स्थिति बनती है तो ये गठजोड़ 2020 के विधानसभा चुनाव में एक आकार जरूर ले सकता है.

वोटों का गणित करता है कुछ इशारा
रवि उपध्याय की बातों को ये आंकड़े भी तस्दीक करते हैं. दरअसल लोकसभा चुनाव मेंएनडीए को कुल मिलाकर 53.3 प्रतिशत वोट मिले. इनमें बीजेपी को 23.6 प्रतिशत जबकि जेडीयू को 21.8 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला. वहीं रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को 7.9 प्रतिशत वोट मिले.

वोट शेयर के मामले में RJD से पीछे चौथे स्थान पर रही. 15.4 प्रतिशत. कांग्रेस को 7.7 प्रतिशत वोट मिले. हालांकि महागठबंधन की इन 2 पार्टियों के अलावा बाकी घटक दलों का भी प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. लेकिन जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के वोट शेयर मिला दें तो यह आंकड़ा 44.9 प्रतिशत पहुंचता है. इनमें छोटी पार्टियों के वोट शेयर मिला दिए जाएं तो यह साठ प्रतिशत से अधिक होता है.

ये आंकड़े एक इशारा जरूर करते हैं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि जेडीयू को जो वोट मिले हैं उनमें बीजेपी के वोट शेयर और बीजेपी को जो वोट मिले हैं उनमें जेडीयू के वोट शेयर भी हैं. जिस अंदाज में सीएम नीतीश ने पूरे चुनाव में पीएम मोदी के नाम पर वोट मांगा है, इसके बाद अलग होने से यह संदेश भी जा सकता है कि नीतीश कुमार ने फिर धोखा दिया.

जोखिम भरा हो सकता है अलग होने का निर्णय
यही बात फैजान अहमद भी कहते हैं कि केंद्र में बीजेपी और जेडीयू को साथ आने का जनादेश दिया गया. इतना ही नहीं यह जनादेश आरजेडी के नीतीश कुमार पर ‘जनादेश की चोरी’ वाले आरोप पर जनता का जवाब भी है. ऐसे में नीतीश कुमार के लिए तुरंत एनडीए से अलग होना जोखिम भरा फैसला हो सकता है.

जनता की नब्ज टटोलने में लगे हैं नीतीश
रवि उपाध्याय का मानना है कि सीएम नीतीश कुमार बेहद गूढ़ राजनीतिज्ञ होने के साथ ही मंझे हुए रणनीतिकार भी हैं. वे बिहार की जनता का मिजाज भी बखूबी जानते हैं, ऐसे में बीजेपी और एलजेपी से अलग होने के लिए वे अगर अगला कोई कदम उठाते हैं तो भी वह आरजेडी के साथ जाएंगे ऐसा नहीं लगता.

बकौल रवि उपाध्याय नीतीश कुमार तुरंत एनडीए से अलग हो जाएंगे ऐसा फिलहाल नहीं लगता है, क्योंकि यह उनकी छवि से भी जुड़ जाता है. हालांकि अपने मंत्रिपरिषद विस्तार में जिस तरह से पीएम मोदी के मंत्रिपरिषद से तुलना करते हुए पिछड़े वर्ग के आनुपातिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया है यह आरजेडी के मुद्दे से भी मेल खाता है. हालांकि आने वाले समय में वह क्या निर्णय लेंगे यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन फिलहाल वे जनता की नब्ज टटोलने में जरूर लगे हैं.