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दिल्ली में पहली बार MCOCA कानून के तहत 6 दोषियों को सुनाई गई सजा

दिल्ली में पहली बार महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका कानून) के किसी मामले का पूरा ट्रायल हुआ और एक साथ इस कड़े कानून के तहत 6 लोगों को दोषी ठहराया गया है. पटियाला हाउस स्थित मकोका के विशेष न्यायाधीश राकेश स्याल ने इन्हें कड़ी सजा सुनाई. 6 दोषियों में एक को 12 साल और अन्य पांच दोषियों को दस-दस साल की सजा सुनाई गई है.

यह मामला 2009 का है जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मानव तस्करी और फर्जी पासपोर्ट मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार किया था. सभी आरोपी तभी से जेल में बंद हैं. इन आरोपियों के खिलाफ ट्रायल चला और इन्हें मकोका के तहत दोषी सजा सुनाई गई.

साल 1999 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा मकोका कानून लागू किया गया था, इसे दिल्ली में 2002 में अपनाया गया. इसके बाद से दिल्ली में मकोका के तहत कई मामले दर्ज हुए लेकिन यह पहला मामला है जिसमें आरोपियों को सजा हुई है.

क्या है मकोका (MCOCA):
1999 में मुंबई राज्य सरकार ने बढ़ती माफिया शक्ति को नियंत्रित करने के लिए मकोका को पास किया था. इस कानून का आधार यही बताया गया था कि मौजूदा आईपीसी की धाराएं राज्य में बढ़ते जुर्म को दबाने में सक्षम नहीं थीं और एक ऐसे कानून की आवश्यकता थी जो संगठित जुर्मों के खिलाफ पुलिस को शक्तिशाली बनाती है. इसके लिए पुलिस के पास अधिकार है कि वो आरोपी के पत्र, टेलीफोन और व्यक्तिगत रूप से किसी से मिलने पर भी रोक लगा दें. किसी भी व्यक्ति पर मकोका लगने के बाद उसे जमानत मिलना नामुमकिन ही है. लेकिन यदि पुलिस 180 दिनों के अन्दर चार्जशीट दाखिल नहीं करती, तो आरोपी को जमानत मिल सकती है.

मकोका लगाने से पहले पुलिस अधिकारियों को एडिशनल कमिश्नर ऑफ पुलिस से मंजूरी लेनी पड़ती है. किसी भी आरोपी पर मुकदमा तभी दाखिल किया जा सकता है जब ये साबित हो जाए कि वो बीते 10 सालों में कम से कम दो बार किसी तरह के संगठित जुर्म का हिस्सा रहा है.

आईपीसी की धारा के तहत जहां चार्जशीट दाखिल करने की अवधि 60 से 90 दिन है, वहीं मकोका लगने के बाद पुलिस को किसी भी आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए 180 दिनों का समय मिल जाता है. मकोका के अंतर्गत जुर्म साबित होने के बाद 5 साल की कैद से लेकर फांसी की सजा हो सकती है.