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चीन और पाक पर रहा सख्त रुख, इसलिए मोदी कैबिनेट 2.0 में शामिल हुए एस जयशंकर

राजनीतिक व्यक्ति जिन्हें शपथ दिलाई गई वो रहे पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर. मोदी कैबिनेट 2.0 में एस जयशंकर को शामिल किए जाने के कई अर्थ हैं और दक्षिण एशिया में चीन-पाकिस्तान से निपटने में उनकी अहम भूमिका हो सकती है.

एस जयशंकर जनवरी 2015 से जनवरी 2018 तक विदेश सचिव रहे हैं. इससे पहले वह सिंगापुर में उच्चायुक्त, चीन और अमेरिका के राजदूत जैसे पदों पर रह चुके हैं. उन्होंने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अमेरिका में भारतीय राजदूत के रूप में उनके प्रदर्शन ने उन्हें विदेश सचिव के प्रतिष्ठित पद पर पहुंचा दिया था.
2015 में ऐसे मिला विदेश सचिव पद

पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह को 2015 में अनौपचारिक ढंग से पद से हटा दिया गया. उनकी जगह जयशंकर को यह पद दिया गया. हालांकि जयशंकर को विदेश सचिव चुने जाने पर कई वरिष्ठों की अनदेखी हुई लेकिन उनकी साख पर कभी भी संदेह में नहीं किया गया.
लंबे समय से जयशंकर को विदेश नीति और रणनीतिक मामलों की बात करने पर मोदी का आदमी माना जाता रहा है. जो लोग जानते हैं वह बताते हैं कि मोदी और जयशंकर के संबंध उस समय से हैं, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे.
जयशंकर के कार्यकाल में चीन ने भारत में किया बड़ा निवेश

मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी चीन यात्रा के दौरान मोदी ने कई मौकों पर जयशंकर से मुलाकात की थी जो कि उस समय चीन के भारतीय राजदूत थे. मोदी विभिन्न चर्चाओं और बैठकों में उनके काम के बारे में जानते हैं. चीन के राजदूत के तौर पर जयशंकर के समय में भारत में चीन ने कई अहम निवेश किए थे. चीन के सबसे महत्वपूर्ण निवेशों में से एक था गुजरात में एक संयंत्र के लिए टीबियन इलेक्ट्रिक उपकरण के साथ एक समझौता.

मॉस्को में हुई पहली बड़ी नियुक्ति

दिल्ली विश्वविद्यालय में सेंट स्टीफन कॉलेज से स्नातक जयशंकर ने राजनीति विज्ञान में एमए की डिग्री और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एमफिल और पीएचडी की डिग्री ली है. वह 1977 के IFS बैच से हैं और उनका पहला बड़ा काम तब हुआ जब उन्हें मॉस्को में भारतीय दूतावास में तीसरा सचिव और पहला सचिव नियुक्त किया गया. रूसी में कुशल, जयशंकर को जापानी और हंगेरियन भाषाओं की भी अच्छी समझ है.

पिता ने तय की थी भारत की पहली परमाणु नीति

जयशंकर ने तीन दशक से अधिक के कूटनीतिक अनुभव और विशेषज्ञता के साथ काम किया है. वह पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के प्रेस सचिव के रूप में भी काम कर चुके हैं. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जयशंकर को देश में रणनीतिक मामलों के सबसे शक्तिशाली दिमागों में से एक माना जाता है. उनके पिता के. सुब्रह्मण्यम को देश की पहली परमाणु शक्ति और आयुधशाला को प्रबंध करने और पहले उपयोग न करने की नीति को तैयार करने का श्रेय दिया जाता है.

जयशंकर पूर्व राजनयिक के रूप में तलब अपने पिता के बाद जगह लेते हैं. विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (अमेरिका) के रूप में अपने समय में जयशंकर ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर बातचीत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अधिक रक्षा सहयोग के मामले में दोनों देशों के लिए एक व्यवहार्य, सुसंगत नीति बनाई.

अमेरिकी राजदूत के कार्यकाल में आया था ये विवाद

देवयानी खोबरागड़े विवाद में किनारा करने के चलते जयशंकर का अमेरिका में राजदूत के रूप में कार्यकाल थोड़ा कठोर रहा. खोबरागड़े डिप्टी कॉन्सुलर जनरल थीं और उन्हें न्यूयॉर्क में अपनी हाउसकीपर संगीता रिचर्ड के साथ वीजा धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. जयशंकर को खोबरागड़े के अमेरिका से बाहर जाने के लिए बातचीत करने का श्रेय दिया जाता है.

चीन में भारत का सबसे मजबूत हाथ

कम बात करने वाले शख्स के तौर पर पहचाने जाने वाले जयशंकर को चीन में भारत का सबसे मजबूत हाथ माना जाता है, जो वहां देश के सबसे लंबे समय तक राजदूत रहे हैं. उन्होंने दोनों देशों के बीच जुड़ाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्हें इस बात का श्रेय भी दिया जाता है कि चीन और कश्मीर के निवासियों को जारी किए गए स्टैप्ड वीजा को समाप्त करने के लिए बातचीत की.

डोकलाम में प्रस्ताव पर बातचीत करने में मदद करने का मिला श्रेय

इसके अलावा जयशंकर को विदेश सचिव के रूप में भारत और चीन के बीच पिछले साल डोकलाम में प्रस्ताव पर बातचीत करने में मदद करने का श्रेय दिया जाता है. विदेश सचिव के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, जयशंकर ने कांग्रेस नेता शशि थरूर की अध्यक्षता में बाहरी मामलों की एक समिति को बताया कि भारत और चीन के बीच सीमा का मुद्दा ‘दुनिया का सबसे बड़ा रियल एस्टेट विवाद’ है और समिति को कैसे भी इसमें बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.