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क्या कांग्रेस का भविष्य अब नेहरू-गांधी परिवार में नहीं है? – नज़रिया

इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से उम्मीद की जा रही थी कि वह 2014 से बेहतर प्रदर्शन करेगी मगर 52 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी.

आलम यह रहा कि कई राज्यों में कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई.

इन नतीजों की समीक्षा के लिए शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई जिसमें अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने भी शिरकत की.

चूंकि इस हार को लेकर राहुल गांधी के नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे थे, ऐसे में इस बैठक में राहुल ने इस्तीफ़े की पेशकश की मगर कार्यसमिति से इसे ख़ारिज कर दिया.

इससे यह स्पष्ट हो गया कि आगे भी कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी ही करेंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि आगे कांग्रेस का भविष्य कैसा नज़र आता है? क्या पार्टी लगातार बड़ी हारों से उबर पाएगी? अगर उसे फिर से वापसी करनी है तो क्या रणनीति अपनानी होगी?कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी चुनौती पैदा हो गई है. सवाल उसके अस्तित्व का है.

2014 में तो समझ में आता था कि 10 साल तक यूपीए सरकार थी, कुछ भ्रष्टाचार के आरोप थे और नेतृत्व की भी समस्या थी. मगर इस बार कांग्रेस पांच साल विपक्ष में बैठी थी और थोड़ा-बहुत तो फ़ायदा होना चाहिए था.

चुनावों में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने प्रचार किया था, कांग्रेस ने अच्छे गठबंधन भी किए थे. उम्मीद थी कि हाल ही में जिन राज्यों में उसकी सरकार बनी थी- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़- वहां कम से कम लगभग तीस सीटें तो आएंगी ही. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

कांग्रेस के नौ पूर्व सीएम हार गए. यहां तक कि अमेठी जिसे कि गांधी परिवार का मज़बूत क़िला माना जाता था, वहां से भी हार मिली. ऐसे में कांग्रेस के सामने बहुत बड़ा संकट है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या करें.