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एक कश्मीरी लड़की की पाँच दिन की डायरी

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फ़ेक न्यूज़ की ताक़त और उसके प्रसार का अंदाज़ा तभी होता है जब आप संघर्ष वाले इलाक़े में हों, जहां हिंसा और विश्वासघात दोनों हो रहे हों, तब आपको किसी सूचना के सही होने पर भी विश्वास नहीं होता.

शुक्रवार से सोमवार शाम तक हम अलग-अलग लोगों से कश्मीर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए जाने और यात्रियों-ग़ैर-कश्मीरियों से कश्मीर छोड़ने की अपील की अलग-अलग वजहें सुन रहे थे. लेकिन हमें कोई जानकारी नहीं थी.

कुछ लोग यह कह रहे थे कि राज्य को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है. कश्मीर को केंद्र प्रशासित प्रदेश बनाया जा सकता है, जम्मू को राज्य का दर्जा दिया जा सकता है, अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाया जा सकता है. यह भी अफ़वाह थी कि यासिन मलिक की मौत हो चुकी है. हर कोई अपनी बात पर शर्त लगा रहा था.

सोमवार को कर्फ्यू लगने की अफ़वाह थी और डर था कि इस बार कर्फ्यू सख़्त और लंबे समय तक रहने वाला है. मैं लाल बाज़ार से अपने घर नाड कडाल के लिए निकली. सड़क पर कोई जल्दबाज़ी में भागता हुआ दिखा. एटीएम के सामने लंबी क़तारें थीं, राशन की दुकानों के सामने दसियों कार खड़ी हो रही थीं. पेट्रोल पंप सूखे थे क्योंकि शुक्रवार की रात में लोगों की भीड़ ने उसे ख़ाली कर दिया था.

एक पेट्रोल पंप पर मेरे कज़न को कहा गया कि पेट्रोल तो है लेकिन उन्हें निर्देश मिला हुआ है कि आम लोगों को नहीं देकर इसे सीआरपीएफ और पुलिस के लिए रिज़र्व रखा जाए.