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आतंक का पर्याय बने आइएस सरगना अल बगदादी के खात्मे के बाद भी चुनौती कायम

आधुनिक युग के सबसे पाशविक चेहरों में से एक अल बगदादी का मारा जाना पूरी दुनिया के लिए एक राहत भरी खबर है। उसने पश्चिम एशिया में इस्लामी चरमपंथी मुहिम के जरिये क्रूरता का तांडव मचाया। सीरिया में अमेरिकी कमांडरों के हाथों बगदादी की मौत से अब यह आतंकी मुहिम कुछ कमजोर पड़ेगी। इसके साथ ही उन तमाम महिलाओं को इंसाफ मिला जिनके साथ आइएस के आतंकियों ने दुष्कर्म किए, उन पत्रकारों के परिवारों के कलेजों को ठंडक पहुंचेगी जिनके सिर इन आतंकियों ने बड़ी बेदर्दी से कलम किए। उसकी मौत उन तमाम सीरियाई एवं इराकियों के लिए किसी सौगात से कम नहीं जो उसके आतंक से त्रस्त थे।

बगदादी की मौत पर अपनी पीठ थपथपा रहे ट्रंप

जहां तक पश्चिम एशिया का सवाल है तो वहां आइएस का उभार उससे पहले आतंक के पर्याय बने ओसामा बिना लादेन की मौत के बाद शुरू हुआ था। बगदादी की मौत यकीनन अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ ही सभी मुश्किलों का हल नहीं निकलने वाला। ट्रंप ने जिस तरह ओबामा प्रशासन के दौरान लादेन के खात्मे के महत्व को कम करके आंका और अपने प्रशासन में बगदादी की मौत पर वह जिस कदर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं उससे यही मालूम पड़ता है कि इस क्षेत्र को लेकर उनकी जानकारी का स्तर कितना कमजोर है।

आइएस का पहला धड़ा- नाकाम, निराश-हताश युवा आइएस में शामिल हुए

2014 में आइएस के उभार में तीन धड़ों की अहम भूमिका रही। इनमें एक धड़ा तो विदेशी लड़ाकों का था। इनमें से कुछ कट्टर जिहादी जरूर थे, लेकिन अधिकांश ऐसे नाकाम, निराश-हताश युवा थे जिनके जीवन में न तो कभी कोई महिला रही, न नौकरी और न ही कोई रुतबा। इस सबको हासिल करने के लिए वे आइएस में शामिल हो गए। आइएस ने ये सब उपलब्ध भी कराया। उसने यौन दासियां उपलब्ध कराईं। ये उन पुरुषों के लिए बड़ी बात थी जो संकीर्ण समाज एवं संस्कृतियों से ताल्लुक रखते थे।