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अपने ही बुने जाल में फंसती शिवसेना, गठबंधन धर्म परस्पर विश्वास और सहयोग पर निर्भर होते हैं

महाराष्ट्र में महायुति कहे जाने वाले भाजपा-शिवसेना गठबंधन की तकरार निर्णायक दौर में पहुंचती दिख रही है। महाराष्ट्र में किसकी सरकार बने, इसे लेकर जहां भाजपा में कोई संदेह नहीं है वहीं शिवसेना टकराव के मूड में दिख रही है। वह न केवल भाजपा पर दबाव बना रही है, बल्कि अपनी आक्रामकता भी दिखा रही है। दरअसल शिवसेना को अपने भविष्य और साथ ही अस्तित्व की भी चिंता सता रही है। चुनावी नतीजों के साथ ही गठबंधन धर्म यही कहता है कि महाराष्ट्र में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना एक जूनियर पार्टनर है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि शिवसेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से कुछ बड़े आश्वासन की उम्मीद में सीनियर पार्टनर की तरह व्यवहार कर रही है। वह शायद महाराष्ट्र की सत्ता में भागीदारी के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाना चाह रही है। यह भी लगता है कि वह अपने नेताओं के लिए राज्यपाल सरीखे पद भी हासिल करना चाह रही है। गठबंधन धर्म परस्पर विश्वास और सहयोग पर निर्भर होता है।

शिवसेना नेता चाहे जो दावा करें, यह बात साफ नहीं हो पा रही है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद को लेकर या फिर सत्ता के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच कोई स्पष्ट बात हुई थी या नहीं? यह भी स्पष्ट नहीं कि अगर कोई बात हुई थी तो उसका स्वरूप क्या था? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि गृहमंत्री के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उद्धव ठाकरे के दावों का पुरजोर खंडन नहीं किया है। उद्धव ठाकरे से लेकर शिवसेना के अन्य नेता सत्ता बंटवारे को लेकर 50-50 के फार्मूले पर जोर देने में लगे हुए हैैं। इस दावे का देवेंद्र फड़नवीस ने तो खंडन किया है, लेकिन अमित शाह की ओर से कुछ नहीं कहा गया है।